स्त्री की लड़ाई पुरुषवादी मानसिकता सेः डॉ.प्रज्ञा

युवा कहानी लेखकों में डॉ.प्रज्ञा एक महत्वपूर्ण नाम है। पिछले दिनों प्रकाशित उनका कहानी संग्रह “तक्सीम” अपने  साम्प्रदायिकता विरोधी तेवर और अनूठी कथा शैली के लिए काफी चर्चित रहा है। नाट्य आलोचना की पुस्तकों जैसेः नुक्कड़ नाटक रचना और प्रस्तुति और नाटक से संवाद व यात्रा संस्मरण  ‘तारा की अलवर यात्रा‘  को भी साहित्य समाज में काफी सराहना मिली है। लेखन के लिए उन्हें भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार 2008  व प्रतिलिपि डॉटकॉम कथा सम्मान 2015 से नवाजा गया है। पिछले दिनों जामिया मिल्लिया  इस्लामिया विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग  द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में जब वो हिस्सा लेने आईं तब हमारे संवाददाता  अभिषेक कुमार ने उनसे बातचीत की। पेश है बातचीत के कुछ अंशः

  • प्रेमचंद से लेकर आज तक के लेखक महिला सम्बन्धी मुद्दों को सामने ला रहे हैं। ऐसे में महिलाओं के प्रति  समाज का दृष्टिकोंण कितना बदला है। इसे आप किस  तरह  देखती हैं ?

वैसे तो प्रेमचंद के समय  से लेकर आज तक के समाज में बहुत अधिक बदलाव आ चुका है। स्त्री आज न सिर्फ जागरूक है बल्कि शिक्षा और रोजगार के दम पर बहुत हद तक  स्वायत्त भी है। इस जागरूकता में सूचना और प्रौद्योगिकी ने बड़ी भूमिका निभाई है। पर सवाल यह है कि क्या उसके बाद  भी समाज बदला ? औरतों के प्रति उसका नजरिया बदला ? उस समय भी स्त्री उपभोग थी और आज भी है। आप फिल्मों को देख लीजिए, आप विज्ञापनों के माध्यम से देख लीजिए। जो स्त्री छवियाँ निर्मित की जा रही है, वो उपभोग के नजरिये से की जा रही है। पर जरुरत है इस समय माधवी (भीष्म के प्रसिद्ध उपन्यास की नायिका ) की तरह जड़ता का प्रतिरोध करने की।

  • चेतन भगत जैसे लेखक महिलओं को जिस एक सांचे (देह के सौन्दर्य) में पेश कर रहे हैं, यह  नारी आन्दोलन को सकारात्मक दृष्टिकोंण प्रदान करता है अथवा नकारात्मक?

देखा जाए तो आज दो  तरह के  लेखन हो रहे  है। एक लोकप्रिय लेखन और दूसरा जनसरोकारों का लेखन। महिला लेखन को लेकर भी दो  तरह के खांचे दिखाई दिए है। एक जो बिकता  है और दूसरा जो बचता है। इस तरह चेतन भगत को आप उसी खांचे में रख सकते है जो बिकता है, जो बाजार की मांगपूर्ती  के लिए लिखा जा रहा है। वहीं जो समाज की जरुरत के  मुताबिक लिखा जा रहा है, वह सरोकारों से जुड़ा हुआ है, इसे ही  जनवादी  लेखन कहा जाता है। इस साहित्य का भविष्य  इतिहास तय करेगा। पॉपुलर लेखन क्षणिक आनन्द देता है। पर साहित्य कोई क्षणिक चीज नहीं है। साहित्य  को इतिहास के घेरे से गुजरना होगा और तब इतिहास तय करेगा कि जो बिकता है वो चलेगा या नहीं। बिकने वाला लेखन ‘चना जोर गरम’ का लिफाफा है। जिसको खाया और फेंक दिया। पर साहित्य का स्थायित्व इतिहास तय करेगा। हालाँकि चेतन भगत जैसा लेखन कोई नई चीज नहीं है। याद कीजिये एक समय गुलशन नंदा भी थे, लेकिन यह पाठक पर निर्भर करता है कि वह गुलशन नंदा  को पसंद करता है या प्रेमचंद  को। पर एक बात तय है कि बाजारवादी लेखन से नारी आन्दोलन को नुकसान पहुंचता है।

 

  • क्या साहित्य महिलाओं के लिए सौन्दर्य को मानक मानता है  ?

मैरी वोल्स्टन क्राट रांसिसी क्रांति के समय में स्त्री अधिकारों की आदि चिन्तक रही है। इनकी एक पुस्तक है “स्त्री अधिकारों का औचित्य साधन ”। इस पुस्तक में इन्हांने एक स्थान पर कहा था कि क्या औरतों को सुन्दर और प्रीतिकर बने रहना जरुरी है ? मैं इसे इसी रूप में मानती हूँ कि सुंदर मतलब सजी-धजी रहना और प्रीतिकर का मतलब वो सजी-धजी गुडिया जो बोले ना। आज इस समाज में जो स्त्री नया विकल्प चुनती है। उसमें सहमति अभी भी नहीं बनी है। हमारे समाज की जड़ पितृसत्ता यह तय कर देती है कि स्त्री को कैसा दिखना चाहिए, कितना हँसना चाहिए, कितना पढ़ना चाहिए और कैसा जीवन जीना चाहिए। स्त्रीवादी साहित्य स्त्री के लिए  सौन्दर्य और जीवन की इन जड़ शर्तों का पुरजोर विरोध करता है।

 

  • क्या आपको लगता कि आज स्त्री समस्याओं  पर बात करते हुए  उनकी विभिन्न  सामाजिक परिस्थितियों पर चर्चा करना जरूरी है ?

शहर  में भी मध्यवर्गीय औरतों की जरुरत अलग है और एक झुग्गी वाली औरत की जरुरत कुछ और है। जैसे मुक्तिबोध  ने कहा है कि “सौन्दर्य अभिरुचियाँ वर्गीय  हुआ करती है।” तो शहर  में भी वर्ग  हैं और गाँव में भी वर्ग  हैं। आज हम देखते हैं कि ग्रामीण र्औरतें ज्यादा मुखर हो कर सामने आ रही हैं वहीं शहरी औरतें भी अपनी लड़ाई लड़ रही हैं। दोनों ही अपनी सामाजिक परिस्थितियों को बदलने के लिए संघर्ष कर रही हैं।

 

  • महिला आजादी की बात करते-करते कुछ महिलाएं एक्टिविज्म  के नाम पर अतिवाद  को बढ़ावा दे रही हैं। उनका मूल तर्क यह है कि यदि  पुरुष ऐसा करता है तो हम क्यों नहीं ? इस सम्बन्ध में आपका क्या मानना है ?

इस पर मेरा यह कहना है कि हम  मनुष्यगत नागरिक अधिकार तो वैसे ही चाहती  हैं जैसे  पुरुषों को मिले हुए हैं। पर बात समानता के साथ स्वतंत्रता की भी है। मैं यह नहीं मानती कि न तो पूरा का पूरा पुरुष वर्ग  शोषक  है और न ही सारी स्त्रियाँ बेचारी। ये दोनों ही पूर्वाग्रह हैं।  पर यह बात तो आप भी मानेंगे कि स्त्री को आज भी अपने सम्मान और अस्तित्व के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। इसीलिए अनेक बार स्त्री मुक्ति आन्दोलन में अतिवाद भी आ जाता है पर स्त्री की मुक्ति की लड़ाई पुरुष की शोषण की मानसिकता से लड़ाई है। पूरी पुरुष जाति से नहीं। मुक्त स्त्री और मुक्त पुरुष ही मुक्त समाज बना सकते हैं।

 

 

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