भारत में अभी कैशलेस नहीं लेसकैश की जरूरत है- प्रो. अरुण कुमार

जेएनयू से सेवानिवृत्त प्रोफेसर अरुण कुमार का नाम अर्थशास्त्री और सामाजिक चिंतन के रूप में महत्वपूर्ण  नामों में लिया जाता है। भारत में काले धन की अर्थव्यवस्था-1999 और आजादी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था नामक पुस्तक भारतीय अर्थव्यवस्था और काले धन के समाज के लिए एक काफी प्रशंसित और प्रासंगिक पुस्तक है। लेखन के लिए इन्हें कई सम्मान भी मिल चुके हैं। समकालीन विश्व में सबसे चर्चित विषय कालेधन की अर्थव्यवस्था और नोट बंदी का फैसला पर हमारे संवाददाता अभिषेक कुमार और सरफराज खान ने उनसे बातचीत की। पेश है बातचीत के कुछ अंश:-

  • अभी देखने को मिला है कि लोगों को काले धन की परिभाषा ही नहीं स्पष्ट है। आपके हिसाब से काले धन की परिभाषा क्या है? इसकी सरल पहचान क्या है?
    पहले तो आपको यह समझना होगा कि काला धन या संपत्ति एक चीज है और काली कमाई एक अलग चीज है। काले धन की अर्थव्यवस्था का मतलब है कि किसी गलत तरीके से की गई कमाई है। जिससे आप अपनी अर्थव्यस्था चला रहे हैं। उस कमाई से संपत्ति हुई और संपत्ति से फिर नगद हुआ। वहीं कला धन नगद के अलावा कई रूपों में उपस्थित है जिसमे जमीन, सोना-चाँदी, हवाला, डॉलर से बदलाव आदि। इससे पता चलता है कि काले धन की अर्थव्यवस्था का मतलब नगद नहीं है। सरकार को गलतफहमी हुई की नगद कम हो जाएगा तो काले धन की अर्थव्यवस्था कम हो जाएगी।
  • नोटबंदी के फैसले के बाद सोशल मीडिया में कई तरह के सवाल उठ रहे थे। जिसमें एक सवाल यह था कि प्रधानमंत्री के पास इस फैसले को लेने की शक्ति नहीं है? सिर्फ आरबीआई या गवर्नर ही विमुद्रीकरण कर सकते हैं।
    ऐसा नहीं है, अध्यादेश लाकर सरकार भी इस तरह का फैसला ले सकती है। 1978 में सरकार ने अध्यादेश ला कर ही विमुद्रीकरण का फैसला किया था। परंतु इस समय जो फैसला लिया गया है इसमें कोई अध्यादेश नहीं लाया गया। वहीं इस सवाल की भरपाई के लिए गवर्नर से लिखित में कुछ ले लिया गया पर सवाल यह उठता है कि क्या बोर्ड की मीटिंग हुई? अगर बोर्ड की मीटिंग हुई होती तो सभी कॉर्पोरेट को इस फैसले का पता चल जाता। क्योंकि वही तो इसके सदस्य होते हैं।
  • आपकी एक किताब ब्लैक इकॉनमी इन इंडिया जो 1999 में लिखी गयी थी। उस समय से लेकर आज के समय में कालेधन के आंकड़े और उसके स्वरूप में कितना फर्क आया है ?
    भारत में मेरे आकलन से 1995-96 में करीब 40 प्रतिशत कालाधन की अर्थव्यव्स्था थी और अब वह आकलन 62 प्रतिशत तक बढ़ गया है। यानी अभी जो डेढ लाख करोड़ की भारतीय अर्थव्यवस्था है उसके ऊपर 93 लाख करोड़ की काली कमाई और जुड़ी हुई है। जीडीपी तो बढ़ रही है अभी डेढ़ सौ लाख करोड़ है अगले साल 162 लाख करोड़ हो जाएगी। वही काले धन की कमाई 96-97 लाख करोड़ हो जाएगी। काले धन की अर्थव्यवस्था सफेद धन के अतिरिक्त है। इस तरह भारत की अर्थव्यस्था कुल 243 लाख करोड़ है। सालों से एकत्रित कालाधन काली कमाई का कम से कम तीन गुना होगा यानी कि करीब 300 लाख करोड़ जिसमें 1% से कम ही नगद काला धन होगा। यानि काले धन से जुड़ा हुआ नगद दो-तीन लाख करोड रुपए ही है वहीँ जो कालेधन का स्वरुप है वह भी काफी बदल गया है। जितनी धंधे है उतनी ही काला धन उत्पन्न करने के तरीके निकल रहे है।
  • आपको क्या लगता है, क्या वह 1 प्रतिशत (दो-तीन लाख करोड़) नगद भी सरकार को मिल पाएगा?
    आने के चांस कम है। क्योंकि जो शातिर दिमाग है। उन्होंने अपना पैसा घुमा लिया है। किसी ने जन धन योजना से कर लिया, किसी ने सोना-चांदी खरीद लिया, किसी ने तुरंत पुरानी तारीख में जमीन खरीद ली, तो कोई अपना वर्किंग कैपिटल दिखा देगा। वहीँ बहुत से उद्योगी अपने मजदूर को तीन से चार महीने की तनख्वाह दे रहे है। इस तरह दो-तीन लाख करोड रुपए में से कुछ नहीं आएगा,अगर आएगा तो बस 30-40 हजार करोड़ रुपए, बाकी तो पहले ही घूम चुका है।
  • फैसले के एक हफ्ते बाद ही सरकार कैशलेश अर्थव्यवस्था की बात करने लगी है, जिसके लिए वो बड़े स्तर पर विज्ञापन भी कर रही है। आपके हिसाब से  यह कदम कितना ठीक है?
    ऐसा इसलिए किया जा रहा है कि सरकार को पता चल गया है कि नोट बंदी के फैसले से तो काला धन निकलने वाला नहीं है तो अब कैशलेस इकनॉमी की बात करके जनता को मुद्दे से भटकाया जा रहा है। अभी भारत में कैशलेसश् अर्थव्यवस्था संभव नहीं हो सकती क्योंकि यहां अधिक संख्या में लोग गाँव में रहते है जो लगभग गरीब-अनपढ़ और इन्टरनेट प्रोद्योगिकी से काफी दूर हैं। इसके अलावा सबसे ज्यादा लोग असंगठित क्षेत्र से है जहां 300-400 रूपये दिहाड़ी वाले मजदुर है तो वह व्यक्ति कितना डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड , कितना पेटीएम इस्तेमाल करेगा। अमेरिका जैसा देश में जहां 20,-25 साल पहले ही इंटरनेट, कंप्यूटर जैसी चीजें आ गई थी और क्रेडिट कार्ड तो 50 साल पहले आ गया था । लेकिन आज भी वहां नगद लेनदेन खूब चलता है, तो हम भारत की बात कैसे कर सकते है मेरा यह कहना है की कैश-लेस की जगह सरकार को लेस-कैश इकॉनमी कहना चाहिए यानी कि कैश कम इस्तेमाल करने की बात होनी चाहिए।
  • सरकार का कहना है कि इस फैसले ने आतंकवाद पर लगाम लगा दी है। आपका क्या मानना है?  
  •  नोटबंदी से जाली नोट पर लगाम लग गयी है, आतंकवादियों पर नहीं । उनके पास और भी तरीके है जिसमे वो सोने से, ड्रग्स से, डॉलर से लेनदेन कर सकते है। सरकार को इन तरीकों पर लगाम लगानी चाहिए थी न की नोट बंदी।
  • क्या यह फैसला राष्ट्रहित में होगा?
    नहीं , न ही इससे काली अर्थव्यवस्था पर लगाम लगा है, न इससे आतंकियों पर वितीय रोक लगी है और वहीँ दूसरी ओर जो हमारी अर्थव्यवस्था पर जबरदस्त धक्का लगा है सभी व्यापार रुक गये है निचले स्तर के लोगो को रोजगार में नुकसान हुआ है। नगद मुद्रा देश में वैसे ही है जैसे शरीर में रक्त और जब उसी को रोक दिया गया है तो देश कैसे चलेगा? फिलहाल अभी इस फैसले को देश हित में नहीं कह सकते है ।

 

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