जीवन और कानून के बीच तालमेल होना चाहिए – जस्टिस भंवर सिंह

जस्टिस भंवर सिंह न्याय के क्षेत्र में बहुत गहरा अनुभव रखते हैं। यह 1970 में यूपी ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट रहे, 1979 में सेशन जज रहे। 1983 से 1987 तक देहरादून में सीबीआई कोर्ट में कई सारे क्रिमिनल केसेस पर सुनवाई की । 1998 में सुप्रीम कोर्ट में रजिस्ट्रार जनरल रहे, 1999 में इलाहाबाद हाईकोर्ट जज के पद पर नियुक्त हुए और 2007 तक हाईकोर्ट की बेंच लखनऊ में अपनी सेवाएं देते रहे। वर्तमान में यह डॉ राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, लखनऊ ट्रिब्यूनल ऑफ दी आर्टिट्रेसन के मानद अध्यक्ष हैं। और अब संस्थाओं के समूह “सनसाइन एजुकेशनल एंड डेवलपमेंट सोसाइटी,ग्रेटर नोएडा” में महानिदेशक के रूप में जुड़े हुए हैं। इनसे हमारे संवाददाता अविरल त्रिपाठी( टीम- अमान सिद्धकी, सिमरन चुग, आकाश सूर्या ) ने न्याय से जुडे कुछ मुद्दों पर बात की।

पेश है उसके कुछ अंश :

अगर हम न्याय के क्षेत्र की बात करें तो आप काफी लंबा और गहरा अनुभव रखते हैं। 1970 में यूपी ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, 1979 में सेशन जज, सीबीआई कोर्ट में क्रिमिनल केसेस का अनुभव। ऐसी बहुत सारी उपलब्धियां न्याय के क्षेत्र में रही है फिर आज शिक्षा के क्षेत्र में इन अनुभवों को किस तरह से उपयोग में ला पा रहे हैं?

जो लंबा काम मैंने कानून के क्षेत्र में किया उससे काफी अनुभव मिला मैंने हजारों की संख्या में मुकदमे देखे हैं उनसे मैंने जो ज्ञान अर्जन किया है वही ज्ञान आज मैं शिक्षा के क्षेत्र में दे पा रहा हूं। इन अनुभवों को जब मैं  छात्रों के सामने बांटता हूं तो मुझे सुखद अनुभूति होती है।

उदाहरण के तौर पर जब मैं लखनऊ हाई कोर्ट में था तो मेरे पास एक पीटीशन आई जिसमें एक पिता अपनी बेटी के केस को लेकर आया और बोला मेरी बेटी को पड़ोस का एक लड़का परेशान करता है और जबरन उसे घर में रोक रखा है। हेबियस कॉर्पस  मैं अगर कोई व्यक्ति अनलॉक तरीके से बंदी है तो उसको कोर्ट के सामने पेश किया जाए और उसकी मर्जी के हिसाब से उसको जहां जाना हो वह जगह सुनिश्चित  कीया जाना चाहिए।  कोर्ट के समन पर वह पेश हुए, लड़की की उम्र 16 साल थी और उसके हाथ में बच्चा था। लड़की ने कहा मैं अपने मर्जी से वहां गई हूं कोई जबरन नहीं ले गया। मैंने उसे नारी निकेतन में भेजा और 2 दिन का वक्त दिया। 2 दिन के बाद पेशी में उस लड़की ने कहा कि मुझे अपने पति के पास ही जाना है। क्योंकि वह लड़की नाबालिक थी इसलिए मैंने उसे उसके पिता को साथ ले जाने के लिए कहा। लड़की ने कहा अगर मुझे पिता के साथ भेजा गया तो मैं आत्महत्या कर लूंगी ।मैंने फिर भी उसे पिता के साथ जाने को कहा अगली सुनवाई पर पता चला कि उस लड़की ने खुद को आग लगा ली है। और सुसाइड की कोशिश की है। उसकी अगली सुनवाई पर मैंने फिर लड़की से पूछा लड़की अब भी अपने पति के साथ जाना चाहती थी। फिर मैंने निर्णय लिया और कहा कानून अपनी जगह है और इस लड़की का जीवन अपनी जगह। जीवन और कानून के बीच तालमेल होना चाहिए। मैंने पिता की पीटीशन खारिज करते हुए उसे पति के साथ जाने का आदेश दिया। ऐसे कई सारे अनुभव को मैं छात्रों के साथ बांटता हूं।

कुछ दिन पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि, सरकार के कई सारे फैसलों में सुप्रीम कोर्ट की दखल अंदाजी बढ़ती जा रही है, इस पर आपकी क्या राय है?

अरुण जेटली जी बहुत सीनियर एडवोकेट है सुप्रीम कोर्ट में भी उनका लंबा अनुभव है। हो सकता है किसी केस में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई निर्णय लिया हो मगर उनके इस बयान से मैं बहुत सहमत नहीं हूं। बहुत सारे केस में सुप्रीम कोर्ट में जो पी आई एल दाखिल हुए हैं उसमें जनता को बहुत लाभ हुआ है। जैसे कि सीनएजी से जनता को लाभ हुआ। बहुत सारे अच्छे अच्छे फैसले आए। जहां सुप्रीम कोर्ट को दखल नहीं देनी चाहिए थी वहां सुप्रीम कोर्ट ने दखल नहीं दी। आप विमुद्रीकरण में देख लीजिए सुप्रीम कोर्ट ने कोई दखल नहीं की ।अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई आदेश नहीं दिया है।

सुप्रीम कोर्ट में जज अपना विवेक संविधान के अनुसार उपयोग में लाते हैं जहां दखल देनी चाहिए वही दखल देते हैं। सहारा- बिरला केस में सुप्रीम कोर्ट के पास पर्याप्त सबूत ना होने के कारण मोदी जी के खिलाफ याचिका खारिज कर दी।

अभी हाल में ही सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया की थिएटर में मूवी शुरू होने से पहले राष्ट्रगान गाना अनिवार्य होगा, कई सारे थिएटर में अडल्ट मूवी भी चलती है। इस पर आप का कमेंट?

अगर थिएटर लीगल है वहां पर भी अगर राष्ट्रगान होता है तो कोई बात नहीं है ।अन्य थियेटरों की तरह वहां भी राष्ट्रगान हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कोई गलती नहीं है। पुरानी सरकारों ने भी कुछ इसी तरह के आदेश दिए हैं ।पहले के वक्त में राष्ट्रगान मूवी के बाद होता था और मूवी खत्म होते ही लोग भाग जाते थे। ऐसे में राष्ट्रगान पहले कर देने से लोग कम से कम राष्ट्रगान करेंगे तो। सुप्रीम कोर्ट का यह अकलमंद फैसला है कि मूवी शुरू होते ही राष्ट्रगान हो जाए उसका मान सम्मान हो जाए। यह हमारी राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है । राष्ट्रगान तो राष्ट्र के लिए ही है। अभी मैंने एक रिपोर्ट पढ़ी जिसमें मुस्लिम राष्ट्रीय संघ ने कहा की आने वाली 26 जनवरी को वह 5000 मदरसों में राष्ट्रगान का कार्यक्रम आयोजित करेंगे यह एक अच्छी पहल है राष्ट्रगान से सोसाइटी में एकता आती है।

आज भारत में राष्ट्रवाद एक मुख्य मुद्दा बन गया है, लोग राष्ट्रवादी होने का सर्टिफिकेट भी दे रहें है।आप इसे कैसे देखते हैं?

राष्ट्रवाद पर मैं कहना चाहूंगा कोई किसी जाति या धर्म का हो राष्ट्र तो राष्ट्र है। इसके प्रति सम्मान होना चाहिए। राष्ट्र के बारे में हम अगर सोचेंगे तभी तो राष्ट्र का उत्थान होगा। जहां तक आपने ओवैसी साहब की बात की अभी हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान उनसे प्रश्न पूछा गया कि आप राष्ट्रगान के समय खड़े होंगे या नहीं जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि यह हमारे कानून में लिखा है मैं इसका सम्मान करूंगा और जरूर खड़ा होगा और मैं राष्ट्रगान गाऊंगा मेरे हिसाब से यह एक अच्छी पहल है।

यूनिफॉर्म सिविल कोड पर आपकी क्या राय है, क्या यह लागू होना चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि यह सही समय है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड पर बात हो। ज्यादातर पार्टी अभी अपनी मेनिफेस्टो में ऐसे शामिल करती है। यह हमारे देश के लिए आवश्यक है उसका एक कारण यह है कि हमारे देश में बहुत सारे धर्म और जाति के लिए अलग- अलग कानून है अगर एक कानून बन जाएगा तो सब उसी का पालन करेंगे। उसमें कोई धर्म बीच में नहीं ला पाएगा। मेरे विचार में यह एक सही फैसला है।

सामाजिक दृष्टि से आपको क्या लगता है ट्रिपल तलाक पर अगर कोर्ट से फैसला आ जाता है तो मुस्लिम लॉ बोर्ड इस फैसले से कितना सामंजस्य बैठा पाएगा?

यह बैठकर समझने की जरूरत है। मुस्लिम लॉ बोर्ड ज्यादा इसके विरोध में रहा है मगर 34 ऐसे मुस्लिम देश हैं जिन्होंने अपने यहां ट्रिपल तलाक बैन किया है ,और दर्जनों ऐसे मुस्लिम देश है जहां एक तलाक की इजाजत है वह भी कोर्ट के जरिए। कई बार तो लोग गुस्से में आकर कह देते हैं तलाक तलाक तलाक । समाज के लिए ट्रिपल तलाक उचित नहीं है जो संविधान का प्रावधान है क्यों ना उसी को माना जाए। शादी का बंधन तो महत्वपूर्ण होता है किसी परिस्थिति में अगर तलाक ले भी रहे हैं तो सोच समझकर कानून के दायरे में रहकर ही लिया जाए।

कोर्ट ने अभी हाल ही में कहा की राजनीतिक पार्टियां किसी धर्म या जाति के नाम पर वोट नहीं मांग सकती। इसको कहां तक सही माना जाए क्योंकि कुछ पार्टियां खुद को हिंदू आइकन और कुछ खुद को मुस्लिम आइकन मानती है, ऐसे में वो जनता से वोट किस तरह से मांगेगी?

आज की तारीख में ऐसा फैसला बहुत जरूरी है, और हमारी सामाजिक व्यवस्था इसलिए खराब है क्योंकि हम लोग जाति धर्म के नाम पर बटे हुए हैं। आजादी का मतलब जाति धर्म नहीं है इसका मतलब है जहां मेजोरिटी में लोग एक चीज को चाहेष जो अच्छा लीडर होता है वह किसी भी धर्म का हो किसी भी जाति का हो लोग उसे ही चुनते हैं, हलाकि कुछ खराब लोग भी चुनकर आ रहे हैं। हम वोटर भी अच्छा मैसेज नहीं देते हैं पिछले दिनों पार्लियामेंट में भी ऐसा हुआ कुछ एमपी  क्रिमिनल बैकग्राउंड के भी आए और अच्छी सहभागिता नहीं दे पाए। टिकट देना पार्टियों का अपना समीकरण होता है जनता को समझदार होने की जरूरत है।

पहले के समय वकालत एक पैशन हुआ करता था, आज का यूथ एक हद तक इससे ग्लैमर के रूप में देखते हुए शामिल हो रहा है इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

समाज में जब बदलाव आया है तो सभी व्यवस्थाएं उसके साथ चलती है। मुझे तो कानून की प्रेक्टिस करने का इतना मौका मिला नहीं मगर उस समय हमारे अंदर सीनियर वकीलों की के प्रति बहुत मान और सम्मान रहता था। आज ग्लैमर इसलिए हो गया है क्योंकि इस फील्ड में पैसा बहुत ज्यादा आ गया है इसीलिए वकीलों की पूछ भी ज्यादा बढ़ गई है। यह बदलाव जनसंख्या में वृद्धि की वजह से भी आया है क्योंकि केसेस भी बड़े हैं ।ग्लैमर में मुझे कोई बुरी बात नहीं लगती समय की व्यवस्था के साथ आता है। 

⇒ इंटरव्यू का वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें

 

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