एक बंद दरवाजा

लिखा है इसे- ध्रुव शर्मा ने

शिषर्क है इसका – बंद दरवाजा

दरवाज़ा एक वो दर है जो हमे दिन से लेकर रात तक सताता है

कभी दूध वाले के रूप में तो, कभी अखबार वाले के रूप में

कभी फूल वाले के रूप में तो, कभी कामवाली के रूप में

कभी पडोसी के रूप में तो, कभी रिश्तेदारों के रूप में

कभी पापा के रूप में जब वो थके आरे दफ्तर से आते है तो, कभी मम्मी के गुस्से के रूप में

कभी दोस्त के रूप में तो, कभी दुश्मनों के रूप में

 

एक बंद दरवाज़ा

 

गुज़रता हूँ मैं जब भी वो दरवाज़ा बंद मिलता है

लेकिन कहते है न उम्मीद में दुनिया कायम है और ये तो सिर्फ दरवाज़ा था तो मैं गुज़रता रहा

मुस्कुराहट थी या रोने का शोर पता नहीं, वो राज़ तो उस दरवाजे के पीछे दफ़न था

मेरे सब्र को देखा सबने, कुछ हमदर्दी देते रहे और कुछ पागल समाज के आगे चल दिए,       लेकिन इंतज़ार मेरा यू ही चलता रहा

 

वो दरवाज़ा जो बंद होकर भी, मेरे दिल, दिमाग, सोच में खुल्ला हुआ था, समझो उसने तो मेरे सपनो में भी कब्ज़ा कर लिया था

लेकिन मेरे गुजरने का कार्यक्रम यू ही चलता रहा और धीरे धीरे वक़्त गुज़रता रहा

 

तूफ़ान, आंधी सब आया तब भी वो दरवाज़ा अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ, जाने क्या राज़ था, जिनका ना हुआ और ना कभी होगा सवेरा

लेकिन में तब भी मुसाफिरों की तरह भटकता रहा

इतना भटकने के बाद मेरी एक ही ख्वाहिश है की ऐसा बंद दरवाज़ा हर एक शक्स को मिले

जो ज़िन्दगी भर बंद रहे और जिनका राज़ हो समंदर से भी गहेरा

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